असफल लोग ज्यादा सफल क्यों होते हैं?

आज समाज के ज़्यादातर लोगों के मन में यह बात बैठी हुई कि "आप जितने बुद्धिमान होंगे, उतने ही आप सफल बनेंगे।" आपके स्कूल, कालेज और रिश्तेदारों के बीच में यह बाते जरूर होती होगी। लोगों को लगता है कि "वही सफल होगा जो बुद्धिमान है।" 


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लेकिन क्या यह पूरी तरह से सच हैक्या कोई संघर्ष किए बिना भी कोई सफल बन सकता हैऔर अक्सर ऐसा क्यों होता है कि ज़्यादातर मामलों में "असफल होने वाले लोग ज्यादा सफल क्यों होते हैं?" 


इन प्रश्नों के उत्तर आपको जरूर ढूंढने चाहिये कि "असफलता के कारण क्या है और असफलता से सफलता कैसे मिले" और यह जानना भी आपके लिए बहुत जरूरी भी है क्योंकि जब आपके मन में इस तरह के सवाल उठते हैं। 


तब आपका दिमाग (चेतन और अवचेतन मन) आपको नई जिम्मेदारियो के लिए तैयार कर रहा होता है। और यह पोस्ट आपकी अभी तक की जानकारी को बदलकर आपकी जिंदगी बदलने वाली है। 

    मनोवैज्ञानिक अध्ययन-

    यह जो प्रश्न है "असफल होने वाले लोग ज्यादा सफल क्यों होते हैं?" जो मुझे और आपको परेशान करता रहता है कि क्या जिंदगी में कुछ बड़ाहासिल करने के लिए संघर्ष करना जरूरी है


    ठीक यही सवाल सन 1920 के समय महान मनोवैज्ञानिक "लेविश टरमन" के मन में भी आया था और तब उन्होंने यह ठान लिया था कि अब वो इस सवाल के जवाब का पता लगा कर ही रहेंगे।


    उन्होंने इसी बात का पता लगाने के लिए एक अध्ययन मतलब शोध किया। उनका यह अध्ययन करीब 40 साल तक चला और यह साइकोलॉजी (Psychology) यानी मनोविज्ञान की दुनिया का सबसे बड़ा और अजीब अध्ययन था और इसी 40 सालों तक चले अजीब अध्ययन का संक्षिप्त हिसाब-किताब आपके समक्ष प्रस्तुत किया जा रहा है।

    "लेविश टरमन" ने अपने इस अध्ययन के लिए अमेरिका के सभी स्कूल और कॉलेजों से सबसे बुद्धिमान (Intelligent) बच्चों को खोजना और  ढूंढना शुरू कर दिया। खोज के आखिर में लगभग ढाई लाख बच्चे पूरे अमेरिका से उन्हें मिले। 


    परन्तु इतने सारे बच्चों पर अध्ययन करना संभव नहीं था। और बच्चों का यह डाटा या जानकारी स्कूल और कॉलेजों ने भेजी थी तो टरमन सिर्फ स्कूलों की बातों पर भरोसा नहीं कर सकते थे। जिस कारण वे सभी बच्चों को नहीं ले सकते। 


    इसलिए उन्होंने इन सभी ढाई लाख बच्चों का बुद्धिमत्ता-स्तर I.Q. (Intelligence Quotient) टेस्ट लिया। 


    I.Q. (Intelligence Quotient) टेस्ट-

    I.Q. (Intelligence Quotient) टेस्ट एक तरह का बुद्धि का टेस्ट होता है, जिसमें छात्रों को अलग-अलग तरह के सवालों का जवाब देना होता है। उन सवालों में से छात्र जितने सवालों का सही जवाब देंगे। उससे उनकी बुद्धि या बुद्धिमत्ता का पता चलता है। 

    टरमन ने यह कहा था कि जिन-जिन बच्चों को I.Q. स्तर 140 या उससे ऊपर आएगा उन्ही स्टूडेंट को बुद्धिमान माना जाएगा। औसतन यानी सामान्य I.Q. का स्तर 90 से लेकर 109 के बीच में होता है। इस दुनिया में ज्यादातर लोगो का I.Q. स्तर 90 से 109 के बीच में ही होता है। जिसको हम सामान्य भाषा में औसत स्टुडेन्ट या आम इंसान कहते हैं। 

     

    और वही जिनका I.Q. स्तर 140 या इससे ऊपर होता है उन्हें बहुत बुद्धिमान माना जाता है. इसके साथ ही जिनका I.Q. स्तर 108 से ऊपर होता है, वह जीनियस होता है या माना जाता है. वैज्ञानिक अल्बर्ट आइंस्टाइन का I.Q. स्तर 160 के आस-पास माना जाता है। 


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    उन्होंने उन बच्चों में से उन बच्चों को घर भेज दिया जिनका I.Q. स्तर 140 से नीचे था और आपको जानकर हैरानी होगी कि ढाई लाख विद्यार्थियों में से सिर्फ 1528 विद्यार्थी ही बचे। I.Q. टेस्ट के हिसाब से ये 1528 विद्यार्थी ही अमेरिका के सबसे ज्यादा बुद्धि वाले बच्चे थे।

     

    और इन 1528 बच्चों का I.Q. स्तर अल्बर्ट आइंस्टीन से मात्र 20 अंक कम था। इन 1528 बच्चों को चुन लिया गया और सालों तक इन पर शोध या अध्ययन किया गया और सभी शोधकर्ताओं और अध्ययन करने वालों को वही देखने को मिला जैसा सोचा गया था। 

    ये बच्चे कक्षा के हर विषय में सर्वोत्तम प्रदर्शन करते थे। हर विषय में सबसे ज्यादा नंबर लाते थे मतलब अपनी पढ़ाई वाली ज़िंदगी में यह राजा थे। पर टरमन के लिए बड़ा सवाल यह था कि ये बच्चे जिंदगी में भी कुछ बड़ा कर पाएंगे या नहीं? स्कूल की पढ़ाई की सफलता को देखकर टरमन  को ऐसा लगने लगा कि जीनियस बच्चे अपनी जिंदगी में जरूर कुछ ना कुछ बड़ा कर लेंगे। 

     

    उन्होने कहा "ये वो स्टूडेंट हैं जो अमेरिका का भविष्य हैं" और यही बच्चे अपनी जिंदगी में सबसे ज्यादा सफलता हासिल करेंगे। परन्तु क्या आप जानना चाहोगे कि इन जीनियस बच्चों का भविष्य में क्या हुआ? टरमन की सोच और उम्मीद, वास्तविकता से बहुत अलग निकली। 


    इन 1528 बच्चों में से सिर्फ 20 बच्चे ही अपनी जिंदगी में कुछ बड़ा कर पाये और करोड़पति बन पाये। बाकी के 1508 जीनियस बच्चों ने आम इंसान की तरह सामान्य नौकरी ही करी। सबसे बड़े कॉलेज की डिग्री के बाद भी वह अपनी जिंदगी में कुछ बड़ा नहीं कर पाए और ना ही वह अपनी जिंदगी सेखुश थे। 

     

    असल में 2 ऐसे लड़के जिनका I.Q. स्तर 100 से भी कम था, जिनका चुनाव नहीं किया गया था। उन लोगों ने नोबेल पुरस्कार भी जीता और वो भी भौतिकी (Physics) के क्षेत्र में। लगभग 40 साल बाद लेविस टरमन ने यह कहा कि 

    "हमें यह पता चला कि बुद्धि और सफलता का दूर-दूर तक कोई संबंध नहीं है। होशियार और बुद्धिमान बनना एक चीज होती है और जिंदगी में सफल होना एक दूसरी चीज।

     

    मतलब अगर आपके दोस्त के अंक (प्राप्तांक) आपसे ज्यादा आते हैं तो इसका मतलब यह नहीं है कि आप अपनी जिंदगी में सफल नहीं होंगे। ऐसा महसूस होता है कि आपका दोस्त आपसे ऊपर है। 

    लेकिन कब तक स्कूल या कॉलेज तक ही न, स्कूल या कॉलेज बाद क्या? लोगों ने ऐसी विक्षिप्त या संकीर्ण मानसिकता फैला रखी है, जिससे पूरे समाज को लगता है कि जिनके ज्यादा अंक (प्राप्तांक) आते हैं वही जिंदगी में ज्यादा सफल और कुछ बड़ा कर सकते हैं। 

     

    अपने आपको इस बात से मत जोड़िए कि आपके अंक (प्राप्तांक) कम आते हैं या फिर आप दूसरे से कम होशियार हैं। इसका मतलब यह नहीं है कि आप आगे जाकर कुछ नहीं कर पाएँगे। 


    प्रस्तुतीकरण प्रदर्शन कौशल (Presentation skills)-

    आप अपने आप को पहचानिए हो सकता हो कि आपकी योग्यता जीवन के किसी और क्षेत्र में हो। कौन जानता है?, किसे पता है? और यह भी हो सकता है कि आप आगे जाकर करोड़पति (Millionaire) बन जायें। 


    आज के समाज ने अंक (प्राप्तांक) और बुद्धि को अधिक मूल्यांकित (Over Rate) कर दिया गया। अधिक मूल्यांकित से मतलब है "जितना महत्व मिलना चाहिए उससे कहीं ज्यादा इन चीजों को महत्व मिलता है।" 

     

    मेहनत से आप कुछ भी पा सकते हैं। ऐसा क्यों होता है? कि अधिकतर बड़े-बड़े लोग हैं, जैसे- "मार्क जुकारबर्ग, अल्बर्ट आइंस्टीन, एलन मस्क" ये लोग डिग्रीयों को इतना कम महत्व क्यों देते हैं


    और शायद आपको पता न हो पर दुनिया की कुछ ऐसी कंपनियाँ हैं जहां पर अगर आपको नौकरी मिल जाए तो आपकी जिंदगी स्वर्ग बन जाए 

    ये जो गूगल और फेसबुक जैसी कंपनियाँ हैं यह लोगों या उम्मीदवारों को डिग्रीयों के आधार पर नौकरी नहीं देतीं बल्कि ये लोगों या उम्मीदवारों का अलग तरीके से टेस्ट लेती है जिसमें उनके अंक (प्राप्तांक) का महत्व शून्य होता है। 

     

    ये कंपनियाँ लोगों या उम्मीदवारों का कौशल और प्रवीणता देखती है जैसे कि आपकी प्रस्तुतीकरण प्रदर्शन कौशल (Presentation skills)  कैसी है? "आप किसी चीज को कितने अच्छे तरीके से समझा सकते हैं।" 


    अगर कोई Topper है जो बचपन से अपने फायदे के लिए ज्ञान को अपने दिमाग में बस भरे जा रहा है, भरे जा रहा है। उसका ज्ञान का क्या फायदा? अगर वह अपने ज्ञान को किसी और को दे ना पाए?


    प्रेरणा और सकारात्मक-

    अल्बर्ट आइंस्टीन ने कहा था कि "यदि आप अच्छी तरह से समझ नहीं सकते हैं, तो आप सरल रूप से समझा भी नहीं सकते हैं (If you can't explain it simply just you don't understand it well enough)" 

     

    जैसे अगर कोई चीज मुझे आती है और अगर मैं आपको समझा न पाउं तो मेरे ज्ञान का क्या फायदा, मेरा दुनिया में होने का क्या फायदा? अगर आपके पास डिग्री नहीं है तो कोई बात नहीं। अगर आपके अंदर प्रेरणा और सकारात्मक सोच है या कोई अलग योग्यता है 

    तो गूगल आपको नौकरी दे सकती है। हां! गूगल और फेसबुक डिग्री वालों को भी नौकरी देती है पर बिना डिग्री वालों को नौकरी ज्यादा देती है क्योंकि गूगल को यह पता है कि कॉलेज के अंक जैसे 90+ या A+ समाज को कुछ खास प्रभावित नहीं करते। 


    सुरक्षा-असुरक्षा की परवाह-

    प्रभावित तो वो चीजें करती हैं जो आपके अंदर है मतलब जो आपकी अलग योग्यता है। गूगल और फेसबुक को यह पता है कि सबके अंदर अलग-अलग प्रतिभा और योग्यता होती है। एक ऐसा काम जो "आपसे अच्छा कोई और नहीं कर सकता, जो आपके अंदर जन्म से ही है।" 


    आप इसे प्रकृति (Mother Nature) का आशीर्वाद या तोहफा मान सकते है। जो प्रकृति ने खास आपको दिया है। तो आप अपना तोहफा यानी कि अपनी योग्यता को पहचाने "सफलता आपके कदम चूमेगी" 


    सफल लोग हमेशा अलग-अलग चीजों को सीखने का प्रयास और कोशिश करते ही रहते हैं, सुरक्षा-असुरक्षा की परवाह नहीं करते। वहीं जो लोग अपनी जिंदगी में सुरक्षित रहना चाहते हैं वे कभी भी अपनी जिंदगी में रोमांच का अनुभव नहीं कर पाते। 


    बच्चों के विकास में बाधा-

    जैसे- ज़्यादातर माता-पिता कहते हैं कि मेरा बेटा अच्छे से पढ़ेगा, इसके अंक (प्राप्तांक) अच्छे आएंगे और इससे एक सुरक्षित नौकरी मिल जाएगी। 

    पर यहाँ पर समस्या यह है कि सुरक्षा की भावना के चलते माता-पिता अंजाने में बच्चों के विकास में बाधा पैदा कर देते हैं या यों कहे कि "असफलता का डर सफलता में सबसे बड़ी बाधा है" जिस कारण उनका बच्चा ऊपर नहीं उठ पाता। 

     

    इस लिए माता-पिता को बच्चों के विकास के लिए एक अलग तरह की सोच रखना जरूरी हो जाता है और सफलता और विफलता की अवधारणा से बचना चाहिए। अगर माता-पिता अलग सोच रखेंगे तो इससे उनके बच्चों के कौशल (Skills) का विकास होगा 


    और वह अपनी जिंदगी को सही मकसद भी दे पाएगा। पर इसका यह मतलब बिलकुल नहीं कि डिग्री मत लो, पढ़ाई मत करो, अंक (प्राप्तांक) मत लाओ। लाओ पूरे अंक (प्राप्तांक) लाओ और कई डिग्रीयां भी अपने पास रखो पर डिग्रीयां के आगे क्या है? उस पर भी गौर कीजिये।

     

    मतलब यह है कि जिंदगी में अंक (प्राप्तांक) के अलावा और भी चीजें हैं जो जिंदगी में बहुत महत्व रखती हैं। आज के लोग अंक (प्राप्तांक) को ही सब कुछ मान बैठे हैं पर बाकी चीजों का क्या? 


    जैसे- संचार (बोली) कौशल (Communication skills),  शारीरिक हाव-भाव (Body language) और शरीर का विकास (Body Development) इन सब चीजों पर आप कोई खास ध्यान नहीं देते हैं जो की अच्छी बात नहीं है। अंक (प्राप्तांक) तो एक सीमित दायरे तक काम आएंगे पर बाकी चीजें पूरी जिंदगी भर काम आएंगे। 

     

    अगर आप एक Topper हैं और आपके अंक (प्राप्तांक) अच्छे आते हैं तो इसका मतलब यह नहीं कि मैं आपकी बुराई कर रहा हूं। मैं आपको यह समझा रहा हूं कि आप अपनी संचार (बोली) कौशल को बढ़ाइए 


    मतलब दूसरों से बातचीत कैसे की जाती है? उसके विकास पर फोकस करें। जापान जिसे दुनिया की सबसे विकसित देशों में से एक माना जाता है। वहां के लोग अपनी बुद्धि और अपने अच्छे व्यवहार के लिए जाने जाते हैं। जापान देश बाकी देशों से इतना खास क्यों है


    शिक्षा प्रणाली (Education System)-

    वहां की शिक्षा प्रणाली (Education System) इसका मुख्य कारण है। वहां की शिक्षा प्रणाली अन्य देशों से बहुत अलग है। जापान में जब तक कोई बच्चा चौथी कक्षा तक नहीं जाता तब तक उसे किसी भी परीक्षा का सामना नहीं करना पड़ता। 


    चौथी कक्षा तक उन बच्चों को जीवन की बुनियादी चीजों को समझाया जाता है बचपन से ही उन बच्चों को वो सब चीजें सिखाई जाती है। जिसे विकासशील देशों के लोग अभी सीखना चाहते हैं।  

     

    जैसे- आत्मविश्वास (Self-confidence) को कैसे जगाएं, विश्वास (Confidence) को कैसे बढ़ाएं? मतलब आत्म-संयम (Self-control) का ज्ञान दिया जाता था। चूंकि इस तरह की भावनाएं या विचार हमारे दिमाग यानी मस्तिष्क (चेतन और अवचेतन मन) से उजागर होते या किए जाते हैं। 

    तो मूलत: उन जापान के बच्चों को मस्तिष्क की चेतन और अवचेतन अवस्था को समझना एवं उनकी स्थिति को संतुलित कर अपने विचारों को लक्ष्य में बदलना सिखाया जाता है। यानी कि सफलता की परिभाषा कैसे बनाई जाती है यह सिखाया जाता है। 


    इससे उनकी शारीरिक अवस्था के साथ आध्यात्मिक ज्ञान की उन्नति भी होती रहती है। और उम्र बढ़ने के साथ-साथ उनकी जिंदगी का लक्ष्य भी साफ होता चला जाता है। 


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    निष्कर्ष (Conclusion)- 

    आपको भी अपने दिमाग यानी मस्तिष्क (चेतन और अवचेतन मन) को समझने पर जरूर ध्यान देना चाहिए और जो आपकी सीमित दायरे की सोच है उससे आगे निकलिए। हो सकता है कि आपको शुरू में अकेले रहना पड़े और कुछ परेशानियों का सामना करना पड़े क्योंकि 


    "फेल वही होते हैं जो प्रयास करते हैं, जो कोशिश करते हैं।" 

    इसलिए फेल होने से कभी मत डरिये, कोशिश करते रहिए, प्रयास करते रहिए क्योंकि जो कोशिश करता रहता है "सफलता उसके ही कदम चूमती है।" 


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