जीवन को बर्बाद करने वाले तथ्य | Life ruining facts

क्या आप अपना जीवन बरबाद कर रहे हैं?

क्या आपने कभी इस बात पर गौर किया है कि जो भी आप सोचते हैं या फिर जिस भी काम को अंजाम देते हैं तो उस काम को सोचने और फिर उसे अंजाम देने के बाद आपको कैसा महसूस होता है


क्या आपके द्वारा किया गया वह काम आपको भविष्य में सुखद अनुभूति करा सकता है या नहीं? या फिर किसी के बहकावे में आकार आप ऐसे काम करते हैं जो भविष्य में आपको आपके परिवार के साथ संकट में खड़ा कर दे, और जीवन को बरबाद करने वाले मोड़ पर ले जाए?


नमस्कार साथियों, स्वागत है आपका! आज हम "जीवन को बर्बाद करने वाले (Life ruining facts) कुछ मनोवैज्ञानिक तथ्यों" पर संक्षिप्त चर्चा करने जा रहे हैं। देखिए कोई भी काम हमें कुछ न कुछ जरूर सिखाता है और खुद के बारे में कुछ नया सीखना या जानना हमेशा दिलचस्प, लाभप्रद और मनोरंजक विषय रहा है।


यही समझ प्रत्येक व्यक्ति को दूसरों से बेहतर और बेहतर बनाती रहती है। दूसरों के साथ हमारा व्यवहार कैसा होता है, साथ ही दूसरे लोग हमारे प्रति कैसा व्यवहार करते हैं? इसी को समझने के लिए हमें मनोविज्ञान (साइकोलॉजी) का सहारा लेना पड़ता है, जिससे मनोविज्ञान का विषय और भी रोचक और आकर्षक बन जाता हैं। 

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इस पोस्ट में हम जीवन को बर्बाद करने वाले कुछ ऐसे मनोवैज्ञानिक तथ्यों को आपसे साझा करने जा रहे हैं, जिनको पढ़ और समझकर आप अपने जीवन को एक नई दिशा दे सकते हैं, और दुरुपयोग होने से खुद को बचा सकते है। चलिए शुरू करते हैं-  


एक संकीर्ण और विक्षिप्त मानसिकता- 

जीवन को बर्बाद करने वाले सबसे बड़े और महत्वपूर्ण कारणों में मुख्य कारण है संकीर्ण और विक्षिप्त मानसिकता। खुद की देखभाल न करना या खुद को स्वस्थ न रखना साथ ही भविष्य की सुदृण की सोच न रखना, एक संकीर्ण और विक्षिप्त मानसिकता की निशानी या पहचान है, जिससे उम्र बढ़ने के साथ बेहतर भविष्य का डर भी सताने लगता है, 

और ऐसे में व्यक्ति गलत प्रभाव में आकर कभी खुद के लिए और कभी-कभी पूरे समाज के लिए संकट खड़ा कर देता है। तो इसका उपाय क्या है? अपने अनुभव के अनुसार कहूं तो संकीर्ण और विक्षिप्त मानसिकता वाले लोगों को कोई भी प्रतिक्रिया देने से पहले उस विषय पर पर्याप्त जानकारी जरूर हासिल कर लेनी चाहिए, 

और दूसरा- दिमाग को केवल गलत और अमानवीय (लड़ाई-झगड़े, शोषण, धोखा देना और हमेशा अभद्र भाषा का प्रयोग करना) कामों में लगाने से बेहतर है कि ऐसे लोगों को अपना ज्ञान बढ़ाने के लिए सदैव तत्पर रहना चाहिए और किताबों से दोस्ती करनी चाहिए।


खुद का दुरुपयोग करने या करवाने से बचें-

आज के समाज सबसे बड़ी विडंबना यह है कि समाज के सरल (भोले) लोगों को अनजाने में खुद के दुरुपयोग होने की पीढ़ा को झेलना पड़ता है, जिसके कारण ये लोग अवसाद (डिप्रेशन) से ग्रस्त हो जाते हैं और


अपने इस डिप्रेशन से बचने के लिए अक्सर ड्रग्स, शराब और गलत संगति का सहारा ले लेते हैं, मतलब अपने जीवन को बरबादी की ओर अनजाने में ही ढकेल देते हैं।


तो उपाय क्या है इससे बचने का? देखिए! समाज के सरल (भोले) लोगों को अपनी "लोगों को आंकने की क्षमता" को विकसित कर और उन्नत बनाना चाहिए, और समाज उन लोगों से बचना और बचकर रहना चाहिए जो उनका दुरुपयोग कर रहे हैं या करते हैं।

दूसरों पर निर्भर रहना छोड़े-

यदि आपको अपने जीवन को सुखद बनाना है तो आपको दूसरों पर निर्भर रहने की आदत या विचार को त्यागना होगा क्योंकि खुद की सहायता या आराम के लिए चीजों का उपभोग करते रहना और दूसरों पर निर्भर रहने का मतलब खुद के विकास में बाधा उत्पन्न करना होता है।


जो कि जीवन को बर्बाद करने का एक मुख्य संकेत है, इसीलिए अपने आपको इतना काबिल जरूर बनाइए, जिससे आप दूसरों पर निर्भर न रहें।


लक्ष्य का न होना-

जिनको यह पता ही नहीं है वे अपनी जिंदगी में क्या करेंगे? मतलब जिन्होंने अपने जीवन का कोई लक्ष्य बनाया ही नहीं है, उनका जीवन या उनकी जिंदगी का कोई महत्व ही नहीं है और ऐसे लोग मनुष्य होते हुए भी पशु के समान हैं।


हालांकि मेरे ये बोल कुछ कड़वे जरूर हैं लेकिन यही सच्चाई है क्योंकि सच सिर्फ उनको कड़वा लगता है जो सच का सामना नहीं कर पाते या करना नहीं चाहते।

 

अपने जीवन को बर्बाद होने से बचाने के लिए हमें अपना एक लक्ष्य तो रखना ही चाहिए, और यह लक्ष्य कुछ भी हो सकता है जैसे- अच्छा स्वास्थ्य, पैसा कमाना या समाज में खुद को सफल बनाना आदि।

लक्ष्य विहीन व्यक्ति अपने प्रत्येक दिन का कीमती समय व्यर्थ में व्यतीत कर देता है पर यही समय, समय आने पर उस लक्ष्य विहीन व्यक्ति के जीवन के बरबादी का कारण भी बनता है। तो समय रहते चेत जाइए और अपने जीवन का लक्ष्य निर्धारण कीजिए।


हमेशा एक बंधन(गुलामी) में रहना- 

रिश्तों में, आदतों में, कैरियर आदि में समान रूप से एक बंधन में रहना भी जीवन बर्बाद होने का कारण बन सकता है क्योंकि इससे व्यक्ति में नए दृष्टिकोण का विकास न के बराबर होता है


और अक्सर ऐसे लोगों में असुरक्षा की भावना के साथ नई चीजों को सीखने से भी डर लगता है। समाज में ऐसे लोगों को लकीर के फकीर की संज्ञा दी जाती है। 


गलतियों से सीखना-

जो लोग स्वयं द्वारा की गई पिछली गलतियों के बारे में चिन्तन नहीं करते हैं और उन गलतियों से कुछ नया नहीं सीखते हैं, वे ही भविष्य में और भी बड़ी गलतियाँ करते हैं और अपने साथ अपने करीबियों के भी जीवन को बरबाद करने का काम करते हैं।

देखिए गलतियाँ हर किसी से होती हैं, लेकिन मुख्य तथ्य यह है कि गलतियों से सीखना ही हमें दूसरों से बेहतर बनाता है, और जीवन को नई दिशा देता है।

एक महान ने कहा भी है कि "जिसने अपने जीवन में कोई गलती नहीं की, उसने अपने जीवन में कुछ हासिल नहीं किया" ------ अल्बर्ट आइंस्टीन


किस प्रकार के लोग हैं? जिनसे आपको हमेशा बचना चाहिए-

 

1.  जिनको केवल अपनी ही चलाना ठीक लगता है। कोई फर्क नहीं पड़ता कि वे हमेशा सही ही हों और उनके दोस्त, रिश्तेदार, माता-पिता और समाज के लोग व समाज में हर कोई गलत हो।

 

2.  जो लोग हमेशा अपनी इच्छाओं की पूर्ति करने के लिए दूसरों से दोस्ती या रिश्ता खत्म करने के लिए प्रेरित करते हों।

 

3.  जो बहुत अच्छी तरह से बात करते हैं लेकिन समय पड़ने पर जब वे अपने किसी स्वार्थ के लिए किसी को भी (दोस्त, रिश्तेदार, माता-पिता और समाज) परेशानी या गर्त में धकेलने में कोई शर्म/हिचक नहीं करते हैं।

 

4.  ऐसे लोग जो हमेशा परिस्थितियों को दोष देते हों।

 

5.  ऐसे लोग जिनके साथ आप उन्हीं के जैसा ही व्यवहार करते हैं तो वे आसानी से बुरा मान जाते हैं या नाराज हो जाते हों।

 

6.  वे लोग जो आपको कभी अपना काम नहीं करने देते, वे जो आपको काम करते हुए, अध्ययन करते समय या कुछ भी महत्वपूर्ण करते हुए हमेशा परेशान करते हों।

 

7.  वे लोग जो खुद को बदलने के लिए तैयार नहीं हैं, और आपको भी बदलने की अनुमति या सहमति भी नहीं देते हों।

 

8.  जो तनिक(थोड़ा) सहयोग या मदद करते हों, लेकिन आपके खास (घनिष्ठ) मित्र बनकर अपने विचारों से आपको भ्रमित कर सकते हों।

 

9.  जो हमेशा अपने भूतकाल (पिछले व्यतीत समय) को गाली देते हों और हमेशा अपने भूतकाल (पिछले व्यतीत समय) के बारे में मूर्खों की तरह शिकायत करते रहते हों।

 

10. जो लोग समाज के निचले स्तर के लोगों के प्रति असभ्य हैं। जो लोग कभी भी मजदूर, धोबी, सफाई-कर्मी और गरीबों का सम्मान नहीं करते हैं और उनसे अशिष्टता से बात करते हैं। क्योंकि उनके पिता के पास इतना पैसा है कि वे इन लोगों को इंसान ही नहीं समझते। इस प्रकार के लोग कभी भी आपके या किसी के नहीं हो सकते। वे आपसे उसी अशिष्ट तरीके से बात करेंगे, जैसे उन मजदूर, धोबी, सफाई-कर्मी और गरीबों के साथ करते हैं।

 

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अंत में,

जिंदगी को खुशहाल या कष्टमय बनाना हमारे ही हाथ में है फर्क बस इतना सा है कि आप किसका चुनाव करते हैं- आबाद होने का या बर्बाद करने का

आशा करता हूं कि आपको इस संक्षिप्त लेख से कुछ नया सीखने को मिला होगा, अगर हां तो comment box में जरूर लिखें, पोस्ट से संबंधित कुछ कहना या कोई सुझाव देना चाहते हैं तो भी लिखें, पोस्ट पसंद आई हो तो इसे अपने दोस्तों और जरूरतमंद लोगों के साथ share जरूर करें।
इस मनोवैज्ञानिक लेख के माध्यम से जीवन को बर्बाद करने वाले तथ्यों को उजागर करने की कोशिश की गयी है। अंत में यही कहना चाहूंगा कि-

"अपने ज्ञान को हमेशा बढ़ाते रहिए, हमेशा कुछ न कुछ नया सीखते रहिए साथ ही गलतियाँ कीजिए और उन गलतियों से सीखकर अपने जीवन को नई दिशा दीजिये।"

 

धन्यवाद!

जय हिन्द! जय भारत!

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