एन्सेलेडस पर महासागरों की खोज | Enceladus moon in hindi

एन्सेलेडस के महासागर हमारी पृथ्वी के महासागरों की तरह हो सकते हैं

वैज्ञानिकों और खगोल शास्त्रियों का मानना है कि शनि के चंद्रमा "एन्सेलेडस (Enceladus)" पर पानी के विशाल महासागर मौजूद है, जो इसकी बाहरी बर्फीली परत के नीचे मौजूद हो सकते हैं।


शनि ग्रह के चारों ओर परिक्रमा करता हुआ, बर्फ की मोटी परतों से ढका एन्सेलेडस चंद्रमा शनि का छठा सबसे बड़ा प्राकृतिक चंद्रमा है, जो वैज्ञानिकों के लिए एक दिलचस्प लक्ष्य बनता जा रहा है। 


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एन्सेलेडस की बर्फ़ीली सतह पृथ्वी की तुलना में कहीं अधिक गहरे महासागर को कवर करती है. Image Credit : NASA

बृहस्पति के चंद्रमा यूरोपा की तरह, एन्सेलेडस भी हमारे सौरमंडल के पानी से भरे हुए चंद्रमाओं में से एक है, जहां पानी की मौजूदगी के कारण अनुमान लगाया जा रहा है कि यहां प्राचीन व पुरातात्विक जीवन मौजूद हो सकता है।


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सन 1789 में पहली बार प्रसिद्ध खगोलशास्त्री विलियम हर्शल द्वारा शनि ग्रह के चंद्रमा एन्सेलेडस को खोजा गया था। 2014 में, सैटर्नियन प्रणाली (Saturnian system) की खोज करने वाले कैसिनी अंतरिक्ष यान ने इस बर्फ से जमे हुए चंद्रमा का परीक्षण किया, 

 

जिससे हमें पता चला कि शनि ग्रह के इस उपग्रह (चंद्रमा) की मोटी बर्फ की परतों (लगभग 20 किलोमीटर मोटी बर्फ की परत) के नीचे महासागर मौजूद हैं। 


एन्सेलेडस पर मौजूद पानी की पुष्टि होने के कारण वैज्ञानिकों और खगोलविदों को इस उपग्रह (चंद्रमा) पर छिपे हुए महासागरों पर अध्ययन करने का अवसर मिला।


शनि के छठे सबसे बड़े चंद्रमा पर महासागरों की धाराओं की जांच करने वाले एक नए अध्ययन से पता चला है कि यहां के जल प्रवाह का पैटर्न इसे उसी तरह से प्रभावित कर सकता है जैसे पृथ्वी पर मौजूद महासागरों का जल अपने प्रवाह से करता है।

    बर्फ की मोटी परत का बनना- 

    कैसिनी अंतरिक्ष यान के हाल के अवलोकनों में पाया गया कि शनि ग्रह के चंद्रमा एन्सेलेडस के दक्षिणी ध्रुव पर गर्भीय आंतरिक गर्मी से संचालित सक्रिय ज्वालामुखी घटनाओं का खुलासा किया है।


    एन्सेलेडस के गर्म कोर के कारण इस पर मौजूद पानी उबाल के साथ ऊपर की ओर उठता है जो उपग्रह के पृष्ठ तक आते-आते ठंडा हो जाता है और फिर पूरी तरह से ठंडा होकर उपग्रह की ऊपरी परत पर जम कर बर्फ बन जाता है। 

    जिस कारण शनि के इस चंद्रमा एन्सेलेडस पर करीबन 20 किलोमीटर मोटी बर्फ की परत बन जाती है। हालांकि वैज्ञानिकों का मानना है कि यह प्रक्रिया एन्सेलेडस पर पिछले कई सौ सालों से होती आ रही है। 

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    कैसिनी अंतरिक्ष यान द्वारा देखे गए एन्सेलेडस पर गीजर का बनना. Image Credit: नासा/जेपीएल-केल्टेक 


    वैसे कैसिनी अंतरिक्ष यान के शनि ग्रह की प्रणाली में पहुचने से पहले, खोजकर्ताओं को लगता था कि शनि ग्रह के बर्फ़ीले चंद्रमा एन्सेलेडस में कुछ खास और दिलचस्प हो सकता है।


    1980 के दशक में वोयाजर (Voyager) अंतरिक्ष यान ने शनि ग्रह का अवलोकन करने के साथ ग्रह के इर्द-गिर्द घूमने वाले पिंडो के चित्र भेजे। हालांकि शनि ग्रह का यह चंद्रमा- एन्सेलेडस हमारे चंद्रमा से छोटा है, इसका व्यास लगभग 504 किलोमीटर के आस-पास ही है।


    नासा की रिपोर्ट के अनुसार एन्सेलेडस की बर्फीली सतह कुछ जगहों पर चिकनी होने के साथ चारों तरफ से सफेद और चमकदार है। जो कि एन्सेलेडस को सौरमंडल में सबसे अधिक चमकने वाला उपग्रह (चंद्रमा) बनाती है।


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    महासागर और सक्रीय ज्वालामुखी गतिविधियां-

    एन्सेलेडस पर मौजूद जल के महासागरों की तुलना पृथ्वी से करने पर पृथ्वी के महासागर झील या तालाब जैसे छोटे आकार के ही है। जबकि यह हम सभी जानते हैं कि पृथ्वी के महासागर पृथ्वी के 75% भाग में फैला हुआ है जो लगभग 3.6 किलोमीटर की औसत गहराई से ग्रह को कवर किये हुए है, 

    वहीँ शनि के छठे चंद्रमा एन्सेलेडस पर जल के विशाल महासागरों ने लगभग 30 किलोमीटर की औसत गहराई के साथ पूरे उपग्रह को 100% पानी की परत के साथ कवर कर रखा है। अमेरिकी अंतरिक्ष एजेंसी- नासा के अनुसार शनि ग्रह के चंद्रमा एन्सेलेडस पर आज भी कई सक्रीय ज्वालामुखी गतिविधियां जारी हैं, 


    जो इस उपग्रह पर मौजूद जल से भरे महासागरों के पानी को गर्म करने का काम कर रही हैं. शनि की ओर जाते हुए कैसिनी अंतरिक्ष यान ने एन्सेलेडस के दक्षिणी ध्रुव का भी अवलोकन किया जो वास्तव काफी विलक्षण होने के साथ दिलचस्प था. 


    एन्सेलेडस के दक्षिणी ध्रुव पर पानी का एक महासागर था, जो संभवत: शनि ग्रह के गुरुत्वाकर्षण बल (ज्वार-भाटा बल) के कारण हो सकता है. ज्वालामुखी गतिविधियों के चलते एन्सेलेडस अपने जल को बाहर अंतरिक्ष में फव्वारों के माध्यम से फेंक देता है. जिससे वैज्ञानिकों द्वारा एक अंतरिक्ष यान की मदद से फेके हुए जल का नमूना लिया जा सकता है।


    प्लम (plume) का नमूना-

    शोधकर्ताओं का मानना है कि जीवन के पनपने के लिए आवश्यक एक मूल तत्व ‘जल (खनिजों से भरा हुआ)' जो एन्सेलेडस पर भरपूर मात्रा में उपलब्ध है. यह एक सम्भावना हो सकती है कि शायद इस उपग्रह पर प्राचीन या पुरातात्विक सूक्ष्म जीवन के लक्षण पनपे हों. 


    2008 में एक करीबी फ्लाई-बाई के दौरान, कैसिनी (Cassini) के उपकरणों ने सीधे प्लम (plume) का नमूना लिया और वाष्पशील (हरित ग्रह प्रभाव) गैसों, जल वाष्प, कार्बन डाइऑक्साइड और कार्बन मोनोऑक्साइड के साथ-साथ कई कार्बनिक पदार्थों के एक आश्चर्यजनक मिश्रण का पता लगाया। कार्बनिक पदार्थों का घनत्व सामान्य की अपेक्षा से लगभग 20 गुना अधिक सघन था। 

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    अंत में-

    कैसिनी के बाद यदि भविष्य में किसी अन्य मिशन द्वारा शनि ग्रह के प्राकृतिक छठे चंद्रमा “एन्सेलेडस” के महासागरों में जीवन की खोज (Enceladus life) की जाती है, तो हमें अपने उस सवाल का जवाब मिल जाएगा कि “पृथ्वी से परे जीवन मौजूद है या नहीं?”.


    साथ यह भी साबित हो जायेगा कि जीवन को पनपने के लिए जरूरी नहीं कि पृथ्वी जैसा वातावरण ही अनिवार्य हो.

    आशा है आपको आज का पोस्ट शनि के चंद्रमा एन्सेलेडस पर महासागरों की खोज में दी गई जानकारी अच्छी लगी हो. ऐसी ही खगोल विज्ञान संबंधी बातें और ब्रह्मांड संबंधी रोचक तथ्य आपको आगे भी पता चलती रहें उसके लिए आप हमारी वेबसाइट को subscribe जरूर करें.


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