मैं और मेरा अनुभव | Me and My Experience

हेल्लो दोस्तों आज मैं आपके साथ मैं मेरा अनुभव experience share करने जा रहा हूं उम्मीद करता हूँ कि आपको पसन्द आयेगा. चलिये शुरू करते हैं ये बात साल 2006 के उन दिनों की है जब मैं अपना graduation complete  कर रहा था,

 

तब कॉलेजों में छात्रसंघ चुनाव हुआ करते थे और कॉलेजों में अच्छी खासी राजनीति हुआ करती थी, कई student पढ़ाई में कम और राजनीति में ज्यादा सक्रिय रहते थे, जहां तक मेरी बात है तो कॉलेजों की राजनीति में मुझे कोई खास अच्छाई नजर नहीं आती थी और ना ही आज नजर आती है खैर छोडिये इन बातों को, चलते हैं अपने विषय की ओर...


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वैसे तो पहले मेरा रुझान संगीत की ओर कोई ख़ास नहीं था लेकिन मुझे क्या पता था कि आने वाला समय कुछ ऐसी करवट लेगा कि मेरी पूरी life ही बदल जायेगी. वो कोई October या September का महीना होगा जब मैंने पहली बार किसी को live गाते हुए सुना था

 

हालांकि ये live singing सामाजिक स्तर पर नहीं था पर फिर भी जो बंदा गा रहा था अपने गिटार के साथ उसकी आवाज या यों कहें कि उसके स्वरों ने मेरे मनके तारों को झंकृत कर दिया था और मुझे ऐसा महसूस हुआ कि जैसे मेरे दिमाग में कोई बड़ा बम-विस्फोट हुआ हो उस समय मैं यह समझ ही नहीं पाया कि मुझे क्या हुआ है बस ऐसा लगा कि हर कोई चीज या वस्तु झूम रही हो.

 

खैर जैसे तैसे वो दिन गुजर गया और रात का आगाज हुआ अब तक दिमाग पूरा हिल चुका था और नींद भी नहीं आ रही थी फिर भी सोने की कोशिश करते-करते सुबह के लगभग 3:30 बज चुके थे. उस समय मेरे पास नोकिया का मोबाइल था जिसमें internet की सुविधा उपलब्ध थी. 

 

हालांकि उस समय internet की जानकारी कम ही लोगों को थी और Smartphone जैसा कुछ भी नहीं था पर मैंने internet चलाना सीख लिया था. खैर मुझे idea आया कि क्यों न internet पर music के बारे में कुछ देखा जाये तो मैंने Google page ओपेन किया और music effect on human brain डालकर search किया,

 

Google ने कई वेबसाइट दिखाई जो अधिकतर अंग्रेजी में थी जो मेरे पल्ले ही नहीं पड़ी, क्योंकि मेरी अंग्रेजी बेसिर-पैर की तब भी थी और आज भी है लेकिन मतलब भर की आती है. सुबह हुई मैंने नहाना-धोना किया और breakfast के बाद collage के लिए चल दिया. आश्चर्य की बात यह है कि पिछले 28-30 घण्टों से मैं एक बार भी नहीं सोया था और ना ही मेरे शरीर में कोई थकान भी थी. 

 

मैंने कॉलेज में अपने सारे lecture भी लिये पर आज के दिन की खास ये थी कि जो भी मेरी आँखों के सामने आ रहा था उसमें कई नये तथ्य और संभावनाएं अपने आप दिमाग में आ जाते थे या यूं कहूं कि मेरे देखने के नजरिये में और किसी बात को सुनने की क्षमता में आश्चर्यजनक रूप से बढ़ोतरी हो चुकी थी

 

और तो और मुझे यह पता भी नहीं चला. मेरे दिमाग के सोचने का दायरा अब बढ़ रहा था. ऐसे ही कुछ दिन यों ही चलता रहा लेकिन एक दिन जब मैं सो कर उठा तो मुझे महसूस हुआ कि मेरे चारों ओर एक घेरा सा बना है और कोई मेरे ऊपर अपनी नजर गढ़ाए है. 


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पहले तो मुझे कुछ अटपटा सा लगा और थोड़ा सा डर भी लगा लेकिन हिम्मत करके मैंने normal आवाज में पूछा कि कौन है? (यहां बताना चाहूंगा कि मैं अपने room में अकेला ही रहना पसंद करता हूँ.) तो जैसा कि मैंने पूछा but उधर से कोई जवाब नहीं आया और ना ही कोई हरकत activity भी हुई.

 

और कुछ समय के बाद लगभग सुबह के 7:30 से 7:45 am तक सब कुछ normal हो गया. OK ये बात late December की है अब Date मुझे याद नहीं है. यह सब होने के बाद मुझे समझ में नहीं आ रहा था कि ये सब साथ क्या हो रहा है और क्या ऐसा सभी के साथ होता है

 

इसके चलते मेरे मन में कई सवालों ने जन्म ले लिया था. और मैं अपने सवालों के जवाब पाने के लिए हमेशा कोशिश करता रहता था पर मूल समस्या यह थी कि मैं अपना सवाल ठीक से पूछ या समझा नहीं पाता था. मेरी व्याकुलता को देखकर मेरे दोस्त मेरा मजाक उड़ाते थे पर उनके मजाक से मुझे कोई खास फर्क नहीं पड़ता था

 

लेकिन एक नयी सम्भावना जरूर दिखाई देने लगती थी सम्भावना जैसे ये मूर्ख मेरा मजाक उड़ाकर मुझे famous बना रहे हैं और यह सही साबित भी हो रही थी क्योंकि कुछ ही दिनों में मैं अपने कॉलेज में पागल बाबाके नाम से जाना जाने लगा था. पर मुझे लोगों की परवाह नहीं थी, मुझे तो बस अपने सवालों के जवाब चाहिए थे.

 

और मैं अपने में ही खोया रहता था धीरे-धीरे exam की date  (जो April से May तक) भी आ गयी थी. पहला exam paper देने के बाद कॉलेज से निकल कर घर जाने के लिए बस पर बैठ गया और अपनी ही सोच में डूबकर कभी हंसता और कभी एकदम शांत हो जाता. इसको देखकर मेरी सीट के पीछे एक सज्जन ने मुझसे पूछा कि क्या हुआ है तुमको? पर मुझे पता ही नहीं चला कि किसी ने मुझसे कुछ पूछा है. 

 

खैर जैसे तैसे दिन गुजर गया और अगले दिन की सुबह आ गयी. अगले दिन second exam था मैं समय से कालेज पहुंचा और अपना पेपर Submit किया और बस लेकर घर की ओर चल दिया इत्तेफाकन वही सज्जन फिर से बस में मिल गये और वे इस बार मेरे बगल में आकर बैठ गए पर मैं अपने में ही मगन था और मेरी हरकतें भी अजीबो-गरीब थी.

 

सामान्यतः देखने में पागलों जैसी. मेरी हरकतों के कारण उस सज्जन से रहा नहीं गया उन्होंने ऊंची आवाज में डांट कर शांत बैठने को कहा. उनकी डांट से मेरा दिमाग एकदम शांत हो गया और मैं चुपचाप शांत स्वभाव के साथ बैठा रहा. 

 

इसके बाद उन्होंने (सज्जन) ने मुझसे कहा कि ये जो तुम्हारे साथ हो रहा है इसका इलाज treatment किया जाना बहुत जरूरी है अन्यथा की दशा में तुम्हारे दिमागी स्थिति बिगड़ सकती है, यह सुनकर मैं चौक गया क्योंकि अजनबी से कोई भी ऐसा सुनना नहीं चाहता पर फिर भी मैंने एक chance लिया. चूँकि मेरे सवाल मुझे बहुत परेशान किए जा रहे थे

 

इसीलिए मैंने तीखे शब्दों के साथ परखने के लिए कहा कि तुम मुझे और मेरे बारे में कुछ भी नहीं जानते हो. इस पर उन्होंने प्रेमपूर्वक कोमल शब्दों में कहा सही कह रहे हैं आप लेकिन जो मैं देख रहा हूँ उसके हिसाब से आपका भविष्य अंधकारमय दिख रहा है 


मैंने पूरी एकाग्रता से उनकी बात सुनी और normal अंदाज में पूछा कि आपको ऐसा क्यों लगा कि मैं ठीक नहीं हूं तो उन्होंने बताया कि ये सब कुछ उनके साथ हो चुका है. इस पर मैंने पूछा कि आप इससे बाहर कैसे आये? 

 

तब उन्होंने अपनी आपबीती कही और इसे बाहर निकलने का मार्ग भी सुझाया. उन्होंने कहा कि इससे निकलने के लिए तुम्हारा जिसमें सबसे ज्यादा मन लगे बस वही काम करो और समाज से हटकर कुछ समय के लिए एकाकी जीवन जीने की आदत डालो इससे तुम्हारे अन्दर ऊर्जा का स्तर normal  हो जाएगा और एक नया व्यक्तित्व निखर कर सामने आएगा जो समाज का कल्याण भी करने में सक्षम होगा. 

 

उनकी बातों ने मुझे पूर्ण रूप से मंत्रमुग्ध कर दिया था. मैंने उनसे बस इतना ही कहा कि मैं पूरा प्रयास करून्गा तो वे बोले बस यही तो मैं सुनना चाहता था तुमसे.  आश्चर्य की  बात यह थी कि इतनी वार्तालाप के बाद भी मैंने उनसे उनका नाम व पता एवं कांटेक्ट नंबर कुछ भी नहीं लिया था.

 

दरअसल कभी-कभी हमारे साथ ऐसा होता है कि कोई व्यक्ति ऐसा मिल जाता है जो आपके जीवन को सही दिशा प्रदान कर देता है इसके लिए यह जरूरी नहीं है  कि आप उस व्यक्ति को भली भांति से जानते हो और यह बात सत्य भी है

 

क्योंकि जो पथ प्रदर्शक होता है या यूं कहूं कि जो गुरु होता है वह कभी भी आपको यह नहीं बताएगा कि वह इस विद्या का यह इस चीज का गुरु है. ये निर्णय आपको स्वयं करना होता है कि आप उनकी बताई गई बातों का अनुसरण करना चाहते हैं या नहीं. 

 

खैर मैंने तो अपने पथ प्रदर्शक द्वारा सुझाए गए मार्ग का अनुसरण करना ही उचित समझा और सबसे पहले अपने ख्यालों/विचारों का गहन मंथन start कर दिया जैसे कि ये विचार कैसे और कहाँ से हमारे मस्तिष्क में आते हैं, चूँकि हमारा शरीर मुख्यतः 5 तत्वों से मिलकर बना है इस लिये यह जानना अति आवश्यक हो जाता है कि विचार के लिए कौन सा प्रधान है या विचार की प्रेरणा किस तत्व से आयी है आदि. 

 

इन कठिन प्रश्नों का उत्तर पाना असम्भव सा प्रतीत हो रहा था परन्तु मेरे तन-बदन में आग लगी हुई थी और इन प्रश्नों के उत्तर प्राप्त करना ही मेरा लक्ष्य था. अपने प्रश्नों के समाधान के लिए मैंने कई तरह की किताबों को पढ़ना शुरू किया.

 

जिस कारण मेरी समझने के साथ-साथ समझाने की क्षमता का विकास एवं विस्तार हुआ. किताबें ज्ञान का भंडार होती हैं यह बात भली-भांति मेरी समझ में आ चुकी थी. जिस कारण मैंने और एकाग्रता के साथ इतिहास, भूगोल, वेदविज्ञान, धार्मिक पुस्तकें, कथा, कहानियांपुराणों के साथ-साथ समसामयिक, ज्योतिष, हस्तरेखा विज्ञान आदि अनेकों पुस्तकों एवं ग्रंथों का अध्ययन तकरीबन 5 से 7 वर्षों तक किया, जो अभी भी जारी है.

 

और धीरे-धीरे ही सही मुझे अपने प्रश्नों के उत्तर समझ आने लगे और साथ में अद्भुत शान्ति का अनुभव भी महसूस हुआ... मेरे अनुभव का यह थोड़ा अंश जो मैंने आप सभी के साथ share किया है. अभी तो बहुत कुछ बाकी है जो आप सभी के साथ share करना है.... समय-समय पर और भी रोचक और रोमांचक अनुभव आपके साथ जरूर share करूंगा.

 

अगर आपको मेरा यह अनुभव पढने में अच्छा लगा और कुछ नया सीखने को मिला हो तो मेरे ब्लॉग को subscribe जरूर कर लेना... ताकि नए अपडेट आपको जल्द ही मिल सके... अभी तक के लिए इतना ही...

जय हिंद! जय भारत!


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